चलें भी तो किस राह पे चलें
ख़्वाहिश है कि उनकी चाह पे चलें
यूँ जीने से तो साँसें भी रुक जाएंगी
अब तो ये भी उनकी हर आह पे चलें
दिन भर इस जिस्म को घसीटते रहना
तेरी हर झलक पे खुद को कोसते रहना
रहना भी है कि नहीं हम को इस जहाँ में
फ़ैसले अब ऐसे भी तेरी सलाह पे चलें
हाल-ए-दिल से काश तुम बेख़बर होते
और हम कभी तेरी नज़र में ना आते
फिर तो इस दिल में भी एक हौसला होता
कि चल बस एक बार तो तेरी निगाह पे चलें
जाने कब तक चलेगा ये इम्तेहान हमारा
जाने कब पिघलेगा ज़िद्दी दिल ये तुम्हारा
ग़ुस्सा नहीं होता मैं हूँ हैराँ ये सोच कर
जाने कैसे लोग ऐसे गुनाह पर चलें
No comments:
Post a Comment