Monday, November 10, 2014

खेल

बिना कुछ साफ़ कहे तुम जो ये पैग़ाम भेजते हो
ये असरार तरीका मुझे पसन्द नहीं आता
जो खयालों को तुम लफ्ज़ों तक ईमान से ले जाते
तेरी रूह की पाकीज़गी पर यक़ीन मुझे आता

ये इश्क़ में दिमागी खेल जो तुम खेला करते हो 
जिसके हर कदम पर फतह का मज़ा तुम्हे आता
गर मेज़ पे या मैदां में मेरे सामने होते
है कौन खिलाड़ी ये मैं तुमको दिखाता 

कभी ढील मुझे देते हो कभी खींच लेते हो
लड़कपन में लड़ाए पेंचों की मुझे याद ये दिलाता 
जज़बातों को मेरे जो तुम मांझा ना बनाते
मैं खुशी से अपने दिल की पतंग तुम्हे हार जाता 

प्यादे मेरे बादशाह के लिये कुर्बान होते हैं
है उनको भी फ़र्ज़ की अज़्मत की कुछ परवाह
चालाकी से मुझे मात दे कर इतराओ जितना तुम 
मेरे प्यादों का ही रंग है 'सफ़ेद' कहलाता

पत्तों को अपने मैं भी हूँ दिल के करीब रखता
है इसमे ही तो बाज़ी की हर चाल का मज़ा
कुछ ताश में भी खेल जोड़ियों के होते हैं
है साथ मिल के जीतने में लुत्फ और आता

नहीं मुखालिफ़ की शिकस्त ही हर खेल का मक्सद
कभी जान कर भी हारने का ज़ौक चखते तुम
मैं तुझ पे सब कुछ हारने को तैयार हूँ बैठा
काश तुझ में एक खिलाड़ी का जज़बा नज़र आता 

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